कैसिक हेराइटा थारू पहिचान ?

कैसिक हेराइटा थारू पहिचान ?

१२२ दिन अगाडि

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१६ कात्तिक २०८०

आनेक टिहुवार हम्रे थारू काहे अपनाइ ?

आनेक टिहुवार हम्रे थारू काहे अपनाइ ?

१४९ दिन अगाडि

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१९ असोज २०८०

असिराम डंगौरा आदिवासी थारू तराईके लडिया फटुँवा बनुवाँ किनारे बसोबास करूइया जात हो । आदिमकालसे बनुवँक् किनारे बैठल कारन थारू समाज तमानेक प्रकृतिक आपत विपत हैजा, मलेरिया जैसिन समाज विनाशक रोगसे डब्नि भिराहुर करटि बचल बा ।  इतिहास साछि बा, हैजा मलेरियासे नाइ डेराइल जात थारू हो कैहके । प्रकृतिसंग जिन्गिक दुःख सुख साटल थारू समाज पितृसंग प्रायः प्रकृतिम रहल जीवजन्तु रूखुवा बरिखुवाक पुजा करठ । टबमारे थारू समाजहे प्रकृतिपुजक फे कैह जाइठ ।  राज्यके एकात्मकवाद गलत अर्थसे अब्बै लगभग ८० प्रतिशत थारू हिन्दू ढरम ओर आटै । थारू खोजकर्ता डा गोपाल दहितलगायत टमान थारू विद्वानहुक्रे थारू प्रकृति पुजकसंग बुद्धिस्ट होईह कनामे जोर डेहल बाटै। मनो यइनके खोज थारू बुद्धिस्ट होईह कना सच हुई फे सेकि नाइ फे।  यदि खोजकर्ताहुक्रे हिन्दू ढरमके प्रभावसे हम्रे हिन्दू हुइ कना सोंच बड्ले सेक्हि कलेसे डा दहितजी लगायतट हमार थारू विद्वानन्के खोज सफल हु जाइ, जहाँसम इ हुइना चाहि । मनो इ लोहेक चिउरा चबैनासे कम नाइ हो।   जे होस्, थारू समाजमे ढरमके बारेम कुछ चेतना आइल बा । आझकल प्राय थारूहुक्रे अपन उपथर, ढरम कला संस्कृतिके खोजमे लागल बाटै ।  थारू प्रकृतिक पुजा करटि अइलाँ, आगे फे करटि रहब । प्रकृतिसे लग्गे हुइलेक कारन हमार बनुवाँ फटुवामे थारूनके खास हक लागठ । थारू समाज परिवारिक जिन्गी चलाइक लग बान्झ फँटुवा सुस्ना डुकरिक झमरा फाँरके खेटि करटि आइल बा। बन्झर बनुवक फँटुवा, आंग कुकैना सुस्ना डुकरि ओ हैजा मलेरिया लगैना मसन्से लरके धरतीक छाती फारके अनेक मेरके अनाज फरैलेक कारन थारून भूमिपुत्र फे कैह जाइठ। जार, घाम, पानी, सिट सहके परिवारके बरस भरिक खैनाक सामा कर्ना थारू जात गैरथारून्के तुलनामे एकडम मेहनटि ओ जिट्टल जात हो। परिवारिक भरन पोसनमे चट्नि भात खाके घाम पानी सहके खेटिक कर्रा काम करल बाफट थारू समाज ‘सिकलसेल एनिमिया’ कना प्रायः थारूनमे किल लग्ना वंसानुगट रोग इनाम फे पैले बा । इ रोगके कारन कैंयो थारू अमचुर हस सुखाके अकालमे मुटि आटै।  थारू जात मेहनत कर्नाम कबु नि डरैठै । अपन रकट पस्ना बहाके परिवार पाले सेक्ना हर थारूनमे छमटा बा । अट्रा मेहनटि थारू हरकुछ जरूरट अपनहि पुरा करे सेकठ टो अभिन सम अटा पाछे काहे बा ? कना प्रस्न आइठ । यकर उत्तरमे यहे कहे सेकजाइठ कि थारू समाज शिक्षामे पाछे टो बा, संगेसंगे बहुट खर्चालु फे बा । खर्चके मामलामे सायड समाजमे रहल सक्कु समुदायसे कैंयों बह्रटा खर्चालु थारूनहे कहे सेकजाइ । देशमे ढरम, जात, भाषा, संस्कृति भुगोलके विविधता बा । यहाँ करिब १४२ जातजाति समुदायके मनै बसोबास करठै । थारूहुक्रे अपन टर टिहुवार टो मनैबे करठै, मनो थारून अपन कोल्कहा टिहुवारसंगे कोइ आगन्टुक, कोइ गैरथारूनके टिहुवार फे बहुट कर्रासे मनैठै ।  ऐसिक टर टिहुवार मनैना हुइलेक ओरसे थारू समाजमे हर महिने टिहुवार मनैना हुइ लागठ । अटवारि, अस्टिम्कि टे अक्के मैन्हम आइठ । हर टिहुवारमे थारू बहुट खर्च करठै । थारूनके प्रायः पैसा अइना कना खेटिक रकम बेचके हो। हम्रे अपन टर टिहुवारमे खर्च टो करठि करठि, मनो औरेक टर टिहुवार फे अपन हो मनाइक परठ कैहके बहुट ज्यादा फजुल खर्च करठि । थारु महिलन् तिज मनाइ लागल बाटै ।  इहे कारन हमार आजा, बुडु माटिम हाँठ, गोर गलैटि अइलाँ, मने कुछ नि प्रगटि हुइल । हमार डाइ बाबा हुक्र हाँठ, गोर गलाइटै, कुछ नि हुइठो । हम्रनसे फे कुछ नि विकास हुइठो, हमार लर्कनसे टो झन कुछ नै उखरि । ओरौनीमे, अट्रै कहम कि हम्रे थारू मेहनत कर्नाम कबु डराइल नाइ हुइ, मेहनट कर्ना, जोस जाँगर हर थारूनके रकटमे बा । कमि बा टो बस खालि शिक्षाके । टबमारे हम्रे हमार समाजमे रहल हर समुडायके टर टिहुवार हे सम्मान डि मनो ओइनके टिहुवार हम्रे नाइ अपनाइ ।  राष्ट्रिय स्तरके टिहुवार फे यदि हमार थारूनके हितमे नाइ हो कलेसे नाइ मनैलेसे फे कुछ फरक नाइ परि । हम्रे अपन थारू टर टिहुवार भर नाइ छोर्ना चाहि । टर टिहुवार टरक भरक बनाइक लग हम्रे रिन काह्रके फे हडसे ढेर खर्च करठि, इ फजुल खर्च बन्ड करि ।  टिहुवारमे जौन फजुल खर्च करठि, उहि हमार लर्कनके शिक्षामे लगाइ । इहिनसे अइना डिनमे हमार थारू समाज कुछ प्रगटि करे सेकि । यडि हमार थारू समाजमे बचत ओ शिक्षा रहि टो कोइ सरकारी नोकरी, सरकारी अनुदानके सायत जरूरत फे नाइ परि । जोशीपुर–५ सिमराना, कैलाली  

मै थारु रुख्वा

मै थारु रुख्वा

१९९ दिन अगाडि

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३२ साउन २०८०

गणेश वर्तमान लिप्स्टिपिक रुख्वा अस् स्वाझ् बाटुँ जिन्नक रुख्वा अस् निख्खार बाटुँ टुँ डुरसे चिन् सेक्लो  मै थारु रुख्वा हुइटुँ। सक्कु ज मैहेँ रोस्ठ सक्कु ज मैहेँ खोस्ठ घरक् खुँटा बनाइक् ला बगर्वक् कोरै बनाइक ला । घरक् खुँटा बनाइबेर किउ कुह्रारिले ठप्काइट् बगर्वक् कोरै बनाइबेर किउ हाँठ्या आरिले ग्याँरट्। टभुन मै चामचिम् पलि रठुँ कट्वा पाइबेर कुह्रार अछिन्के  महि ठप्क नि आइट् पानी नि पाक रुइना  ढन्सुहिअस् चिल्लाइ नि आइट् उह मार,  कैहेनिक् मन्त्री मन्डलम फे  महि काट्के और जाहिन गस्किल । मै भित्र भित्र कठ्याक् रुइनु  उ बाट् म्वार आँख् हन पटा बाटिस् आपन्न सङ्घारि मन रुइबेर डुन्ड्रि अस् आँस् बहाइ नि पैलक् डुख् साइट् मै टेनक् रुख्वा अस् रटुँ ट के ह्यारट् महि ? साइट् मै गुल्ह्रिक रुख्वा अस् रटुँ ट के ड्याखट् महि ? कैहेनि शिक्षा ऐन म फे म्वाँर फेड्रि ठप्कल । म्वार छाहिँ हटिल । टभुन मै ऐया वा फे नि कनु । महि काजे ठप्कलो नि कनु महि गेर्ना हाँठ्हन नि पिट्नु महि ग्याँर कना मुँहन नि ठुक्नु मै लाट् कलसे  जाँर ढोक्क जन्नि गर्याए आइट् मै हाँठ् नि लगिनाहा कलसे आपन जन्निहन ठठाइ आइट् टभुन महि कटुइयनके लाक् लिप्स्टिपिक रुख्वाअस् स्वाझ् बाटुँ जिन्नक रुख्वाअस् निख्खार बाटुँ । मै थारु रुख्वा ।।

भेंरह्वा रामदास

भेंरह्वा रामदास

३०४ दिन अगाडि

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२१ वैशाख २०८०

दिपक चौधरी असीम मंगल थारु एकठो कमैयाँ, जे डोसरके घर काम कर्के अपन घरेक गुजारा करठ् । मंगल अपन लर्का बच्चा परिवारके संग एकडम खुसि रहट् । मनो उ अपन मन भिट्टर अनेक सपना डुख पिरा छुपैले रहट् ओ अपने परिवार उइन सड्डा खुसि बनैले रहट् ।  ढिरे ढिरे लर्का बच्चा बह्र्टि जैठिस ओ मंगलके जिम्मेवारि फेन बह्र्टि जैठिस । मंगल आउर भारि चिन्टामे डुब्टि जाइट् ओ गम्भीर डेखाइट । यि सब ओकर बर्का छावा हेर्टि जैठिस ओ अपने मनमे कुछ करे पर्ना सोंच बनाइ लागट् । एक डिन बर्का छावा मंगल हे कहलिस,  ‘बाबा, मै फेँ किस्नान घर काम करे जिम ।’  टब मंगल कहल, ‘टै का काम करे जिबे ?’  बाबक् परस्न सुन्के छावा कहल, ‘किस्नान भेंरि चर्हैम ।’  ‘ठिक बा, किसन्वैंसे पुछम टे चलिस भेंरि चर्हाइ,’ कैह्के मंगल कहल ।  डोसर डिन बाट बट्वाके अपन बर्का छावै भेंरि चर्हाइ लगा डेहट् ।  मंगलके बर्का छावा रामदासके साल भरिक भेरि चह्रैलक् एक मन ढान टन्खा रहिस । उहिसे घरक कुछ समस्या टरे लग्लिस ।  रामदास सक्कारे रोज भेंरि ले ले खेट्वम जाइठ् कलेसे गाउँक आउर लर्का झोला, कापि, पोस्टा ले ले स्कुल जाइट् । उ सब डेख्के रामदास के मनमे फेन पर्हे जैना रहर जागे लग्लिस ।  उ एकडिन अपन बाबा हे कहल, बाबा मै पर्ह जैम ट नैहुइ ?  छावक असिन बिचार सुन्के मंगल कहल, ठिक बा काल्ह किसन्वैसे छुट्टि माँग्डेम टब चल्जाइस पर्ह । बाबक असिन बाट सुन्के रामदास बरा खुसि हुइल ओ डोसर डिनसे बिना झोलक गाउँक लर्कनसंग स्कुल जाइ लागल । डुइचार डिन पाछे मंगल रामदास के लग झोला, सिलोट व गौखर किन्डेलिस ।  समय बिट्टे गैल । रामदास मेहनटके साठ स्कुल पह्र्टि गैल । मंगल फेन डुख कर्के भुख्ले रैह्के फेन अपन छावा हे पर्हाइल । रामदास फेन डस्वा मजा नम्बर लानके पास हुइल । ओ क्याम्पस पर्हक लग सदरमुकाम धनगढी जाइ पर्ना हुइलक ओंरसे इहिसे आगे पर्हाइ नैसेकम कैह्के मंगल अपन छावक ठन कहल ।  रामदास फेन बाबक् बाटेम कुछ नै कहट् । काहे कि अट्रा डुख कस्ट कैके जौन सिक्षा डेहल बाबा, आब एकर सडुपयोग महि कर्ना बा कैह्के मनमे सोचटि चुपचाप रहि जाइट ।  समय अपन डगर निरन्टर बिट्टि जाइट् । रामदास अपन गाउमे परोढ पर्हैना मौका पा जाइठ् ओ गाउँमे मस्टर्वा कैह्के चिन्हे लग्ठिस । एक डिन मंगल रामदास के भोज कैना बाट अपन गोसिन्यासे चलाइठ् । ओ, कुछ डिन पाछे रामदास के भोज फग्नीसे हो जैठिस । मंगल के परिवार बह्रजैठिस ।  समय बिट्टि जाइठ् । रामदासके फेन लर्का बच्चा हुइठिस ओ सारा घरक जिम्मा मंगल रामदास हे सौंपडेहट् ।  रामदास भारि समस्यामे डेखा परट्। मनो हिम्मत नैहारठ् ओ घर जसिक टसिक चलाइठ्। ।  एक डिन रामदास फग्नीहे कहल, अरि गाउँमे किल काम कर्के घरक समस्या नैचलि । लर्का बच्चा परहैना घर डुवार चलैना बा । ओहेक मारे महिं कुछ डिन बाहर लागक परि । टब जाके गुजारा हुइ । इ सब बाट सुन्के फग्नी कहल गाउँमे काम नैकर्बो टे कहाँ जैबो?  रामदास कहल, सबजे इन्डिया जैठ मै फेन चल्जिम ।  फग्नी कलि, टु चल्जिबो टे मै कसिक घर चलैम ओ रहम ?  रामदास सम्झाइल, जस्टे सबजे रठै ओस्टके टे काहुन् ।  अट्रा सल्लाह कैके डुइचार डिन पाछे रामदास लागल इन्डिया कमाइ ।  अपन घर परिवार के खुसि खोजे घर परिवार छोर्के रामदास हुइल गाउँघरसे डुर । राट डिन काम, डेंहक पस्ना सुखाइ नै पैना, राटिक निंड डिनेक भुख मेटाइ नै पैना । डुखसे जुझ्टि, भुखसे लर्टि समस्या हटैना सपना पुरा कैना लक्ष्य लेके परडेस लागल रामदास ।  हरेक महिनक् पैसा घरे पठैटि रहठ् रामदास । फिर भि समस्यक समाढान नै हुइठिस र झन् टे समस्या बहर्टि जैठिस ।  रामदासहे स्कुल पह्राइक लग लेहल मंगलके रिन डुइ सौ से बहर्के बीस हजार पुग्गैलिस । इ सब डेख्के सुन्के असिन लागट् गरिब मनैन्के जिन्गि कुछ जिन्गि नैहो जसिन ।  यहोंर फग्नी गिटेम् मनक् बट्ठा सुस्करठः  कहाँ जाके ओराइट गरिबन्के डुखक सग्रा ।  कब सम रहेक परि अकेलि हेर्के अस्रक डग्रा ।  सुख डुखके बख्रा बराबर लगाइ नै जानल कि का,  लम्मा करल जिन्गिक डग्रा बिढाटा फेँ हरेक अँख्रा ।                                                                 कैलारी–२ बसौटी, कैलाली  

गजलः नैचाहि सोना चाँडि

गजलः नैचाहि सोना चाँडि

३१२ दिन अगाडि

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१४ वैशाख २०८०

दिपक चौधरी असीम नैचाहि सोना चाँडि महिन मैयाँ कैना मन हुइलेसे  उहे मन मन्डिलमे मैंयक् बख्खारिक् ढन हुइलेसे।  रुप्या पैसा व सुग्घर रुप एक समान कह्ठै सब्जे,  जाट्टिसे आझ बा काल्ह नैहो माटिक् टन हुइलेसे।  ना लेके अइनुँ ना लेके जैबुँ इ मटलबि डुनियाँसे मै,  सङ्गे आइल अपन पिंजराफेँ छोर्जिम मरन हुइलेसे। बचन कान सुनट् मारलसे भारि चोट मुटुम लागट्, आँखिसे आँस बहट् छाटिक भिट्टर जलन हुइलेसे।  माटिक् सरिर माटिम मिल्जाइट पटै बा सब जहन,  आत्म उर्जाइट् डेंह लास ओर्हाइल कप्फन हुइलेसे।  जन्मना मुना प्राकृतिक नियम नाउँ अमर हो जाइठ्,  कौनो मजा कर्म सुन्डर कृटि व मिठ बचन हुइलेसे।                                 कैलारी–२ बसौटी, कैलाली  

मेर मेरके फुला फुलल् डेख्ठुँ 

मेर मेरके फुला फुलल् डेख्ठुँ 

३२४ दिन अगाडि

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०१ वैशाख २०८०

दिपक चौधरी "असीम" प्राकृतिक बग्यामे मेर मेरके फुला फुलल् डेख्ठुँ  ओहे फुलामे जोग्नि, मढ्वा,भौंरा भुलल् डेख्ठुँ।  अपन बोलि भासा संस्कृति पहिरान छोर्के यहाँ,  लावा युबा हुक्रन बिडेसि संस्कारमे डुलल् डेख्ठुँ।  कट्रा सुहावान हमार अप्ने नाचकोर गिटबाँस बा, फेर काजे इ छोर्के फिल्मि डुन्यँम् झुलल् डेख्ठुँ।  डफ्ला मन्ड्रा, झाल मजिरा कस्टार हमार संगिट,  इ सब छोर्के बजारमे डिस्को डिजे खुलल् डेख्ठुँ।  कसिके लावा पुस्टाहे हमार अपन संस्कृति डेना हो,  एहे सोंचमे हमार पहिचान हेरैना डर नुकल् डेख्ठुँ।                                 कैलारी २ बसौटी, कैलाली